सनातन धर्म एवं संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु अपना सम्पूर्ण जीवन जोड़ने वाले आचार्य जी का जन्म मार्च, 1977 में बामनवास तहसील के छोटे से गाँव बिचपुरी में कौशिक गोत्रीय ब्राह्मण परिवार में हुआ। आचार्य जी ने प्रारंभिक शिक्षा अपने ही क्षेत्र से पूरी कर राजस्थान विश्वविद्यालय से शास्त्री, तिरुपति बालाजी (आ.प्र.) से शिक्षा शास्त्री तथा काशी से आचार्य की उपाधि प्राप्त की। आपने वृन्दावन (उ.प्र.) में रहकर श्री रामकथा एवं श्रीमद्भागवत महापुराण का अधयन 2002 तक पूरा कर जयपुर आगमन किया। आचार्य जी का कार्यक्षेत्र कथा व्यासत्व तक ही सीमित नहीं है, अपितु जयपुर आकर अपने ज्ञान-ध्यान से ज्योतिष एवं वास्तु की सेवा देना प्रारंभ किया। वर्तमान में ज्योतिष फलित पर आपने अनेक शोधकार्य एवं सटीक गणनाएँ की हैं।
आचार्य जी अध्यात्म के महान उपदेशक एवं प्रखर प्रवक्ता हैं। वे मधुरवाणी, रससिद्ध वक्ता, सहृदय, सहजता, ज्ञान, वाक्-माधुर्य इत्यादि गुणों से परिपूर्ण व्यक्तित्व के धनी हैं तथा उनकी प्रवचन शैली अत्यन्त सारगर्भित, सुमधुर एवं ओजपूर्ण है। उनके प्रवचन सर्वजनहिताय हैं। ऐसी महान विभूति के मुखारविन्द से आपको श्रीमद्भागवत कथा-श्रवण का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। उनके मुख से निःसृत भागवत आपके मन में आध्यात्म की रश्मियों को पूरित करने में पूर्णतः सफल होगी, जो जन-जीवन के प्रत्येक पहलू को सफल, उज्ज्वल, शुद्ध एवं पावन बनाती है।
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